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फिर अमरित की बूंद पड़ी: Phir Amrit Ki Bund Pari

फिर अमरित की बूंद पड़ी: Phir Amrit Ki Bund Pari
$14.80$18.50  [ 20% off ]
Item Code: NZA647
Author: ओशो (Osho)
Publisher: OSHO Media International
Language: Hindi
Edition: 2012
ISBN: 9788172612528
Pages: 99 (1 B/W illustrations)
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch
weight of the book: 125 gms

 

पुस्तक के विषय में

देश तो होते ही नहीं । देश तो झूठ है । राष्ट्र तो मनुष्य की ईजाद हैं । असलियत है व्यक्ति की । इस देश ने गौतम बुद्ध, उपनिषद के ऋषि, महावीर, आदिनाथ-आकाश की ऊंचाई से ऊंचाई छुई है । वह भी एक भारत है । वही पूरा भारत होना चाहिए ।

और एक भारत और भी है । राजनीतिज्ञों का, चोरों का, कालाबाजारियों का । भारत के भीतर भारत है ।

इसलिए यह सवाल नहीं है कि कौन देश श्रेष्ठ है और कौन देश अश्रेष्ठ है? सवाल यह है कि किस देश में अधिकतम श्रेष्ठ लोगों का निवास है और किस दिश में अधिकतम निकृष्ट लोगों का निवास है। भारत में दोनो मौजूद हैं ।

ओशो इस पुस्तक के कुछ विषय बिंदु:-

ध्यान प्रक्रिया है रूपांतरण की

मेरी दृष्टि सृजनात्मक है

मैं तुम्हें इक्कीसवीं सदी में ले जा सकता हूं

भारत:एक सनातन यात्रा

प्रवेश से पूर्व 

स्त्री मां बनने से ही मातृत्व को पाती है, यह भी सही नहीं है । क्योंकि लगभग सारी स्त्रियां बच्चे यदा करती है, मां बनती हैं, पर मातृत्व की कोई गरिमा, कोई ओज, कोई तेज दिखाई तो नहीं देता । इसलिए मेरी परिभाषा दूसरी है । मेरी परिभाषा में मां बन जाना जरूरी नहीं है, मातृत्व को उपलब्ध होने के लिए ।

मां तो सारे जानवर अपनी मादाओं को बना देते हैं । सारी प्रकृति, जहां-जहा मादा है, वहां-वहां मां है । लेकिन मातृत्व कहां है इसलिए मातृत्व को और मां को स्वार्थी न समझें । यह हो सकता है कि कोई मां न हो और मातृत्व को उपलब्ध हो, और कोई मां हो और मातृत्व को न उपलब्ध हो ।

मातृत्व कुछ बात ही और है । वह प्रेम की गरिमा है ।

मै चाहूंगा कि स्त्रियां मातृत्व को उपलब्ध हों, लेकिन उस उपलब्धि के लिए बच्चे पैदा करना बिलकुल गैर-जरूरी हिस्सा है । ही, उस मातृत्व को पाने के लिए हर बच्चे को अपने बच्चे जैसा देखना, निश्चित अनिवार्य जरूरत है । उस मातृत्व के लिए ईर्ष्या, द्वेष, जलन इनका छोड़ना जरूरी है । बच्चों की दर्जन इकट्ठी करनी नहीं!

और फिर हमारे देश में जहा इतने बच्चे बिना माताओं के हों, वहा जो स्त्री, अपना बच्चा पैदा करना चाहती हो, वह मातृत्व को कभी उपलब्ध नहीं होगी । जहां इतने बच्चे बिलख रहे हैं, अनाथ, मां की तलाश में, वहां तुम्हें सिर्फ इस बात की फिकर पड़ी हो कि बच्चा तुम्हारे शरीर से पैदा होना चाहिए । उस क्षुद्र विचार को पकड़ कर कोई मातृत्व जैसे महान विचार को नहीं पा सकता है । जहां इतने बच्चे बिलखते हों अनाथ, कोई जरूरत नहीं है बच्चा पैदा करने की । इन अनाथ बच्चों को अपना लो । इनके अपनाने में, इनको अपना बनाने में, वह जो दूरी अपने ओर पराए की है, वह गिर जाएगी । इनको अपना बनाने में, वह जो ईर्ष्या और जलन और द्वेष की क्षुद्र भावनाएं है, वे गिर जाएंगी । और इनको बड़ा करने में और इनको पल्लवित और पुष्पित होते देखने में जो आनंद उपलब्ध होगा, वह आनंद अपने ही बच्चों को चोर बनते, बेईमान बनते, भीख मांगते, जेलों में सड़ते देख कर नहीं हो सकता ।

मातृत्व का कोई संबंध जैविक शास्त्र से नहीं है । इसलिए कोई पशु मनुष्य को छोड़ कर मातृत्व को उपलब्ध नहीं हो सकता । मां तो बन सकती है हर मादा, लेकिन मातृत्व की संभावना केवल स्त्री को उपलब्ध है । और वह उपलब्धि चारों तरफ फैली हुई है ।...

निश्चित ही मां, मातृत्व की पूर्णता स्त्री का आत्यंतिक गौरव है! लेकिन बच्चों की कतार लगाने से नहीं, वरन अपने प्रेम को इतना ऊपर उठाने से है कि जहां से प्रत्येक व्यक्ति अपना बच्चा ही मालूम हो । ये धारणाए लोगों तक पहुंचानी जरूरी हैं, क्योंकि वे गलत धारणाओ के नीचे बच्चे को पैदा किए चले जा रहे हैं । और ये लोट कर भी नहीं देखते कि उनकी धारणाओं के लिए कोई भी सबूत नहीं है। करोड़ों स्त्रियां हैं, बच्चों की कतारें हैं, कौन सा मातृत्व है? करोडों स्त्रियां हैं, कौन सी पूर्णता है?

 

अनुक्रम

1

ध्यान प्रक्रिया है रूपांतरण की

1-14

2

एक नया ध्रुवतारा

15-32

3

मेरी दृष्टि सृजनात्मक है

33-48

4

मैं तुम्हे इक्कीसवी सदी मे ले जा सकता हूं

49-64

5

भारत एक सनातन यात्रा

65-82

ओशो-एक परिचय

83

ओशो इंटरनेशनत्न मेडिटेशन रिजॉर्ट

84-85

ओशो का हिंदी साहित्य

86-90

अधिक जानकारी के लिए

91-92

 

 

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