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Books > Hindu > हिन्दी > मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....
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मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....
मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....
Description

पुस्तक के विषय में

रैदास कहते हैं: मैंने तो एक ही प्रार्थना जानी-जिस दिन मैंने मैंऔर मेराछोड़ दिया। वहीं बंदगी है। जिस दिन मैंने मैं और मेरा छोड़ दिया। क्योंकि मैं भी धोखा है और मेरा भी धोखा है। जब मैं भी नहीं रहता और कुछ मेरा भी नहीं रहता, तब जो शेष रह जाता है तुम्हारे भीतर, वही तुम हो, वही तुम्हारी ज्योति है-शाश्वत, अंनत, असीम। तत्वमसि! वही परमात्मा है। बंदगी की यह परिभाषा कि मैं और मेरा छूट जाए, तो सच्ची बंदगी।

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु: प्रेम बहुत नाजुक है, फूल जैसा नाजुक है! जीवन एक रहस्य है मन है एक झूठ, क्योंकि मन है जाल-वासनाओं का अप्प दीपो भव! अपने दीये खुद बनो प्रेम और विवाह साक्षीभाव और तल्लीनता ओशो के होने ने ही हमारे पूरे युग को धन्य कर दिया है। ओशो ने अध्यात्म के चिरंतन दर्शन को यथार्थ की धरती दे दी है।

आमुख

आदमी को क्या हो गया है? आदमी के इस बगीचे में फूल खिलने बंद हो गए! मधुमास जैसे अब आता नहीं । जैसे मनुष्य का हृदय एक रेगिस्तान हो गया है; मरूद्यान भी नही कोई । हरे वृक्षों की छाया भी न रही । दूर के पंछी बसेरा करें, ऐसे वृक्ष भी न रहे । आकाश को देखने वाली आंखे भी नहीं । अनाहत को सुनने वाले कान भी नही । मनुष्य को क्या हो गया है?

मनुष्य ने गरिमा कहां खो दी है? यह मनुष्य का ओज कहां गया? इसके मूल कारण की खोज करनी ही होगी । और मूल कारण कठिन नहीं है समझ लेना । जरा अपने ही भीतर खोदने की बात है और जड़ें मिल जाएंगी समस्या की । एक ही जड़ है कि हम अपने से वियुक्त हो गए हैं; अपने से ही टूट गए हैं अपने से ही अजनबी हो गए हैं!

और जो अपने से अजनबी है, वह सबसे अजनबी हो जाता है । अपने को जिसने पहचान लिया, उसकी सबसे पहचान हो जाती है । उसके लिए अजनबी भी अजनबी नहीं रह जाते, क्योंकि उसे दिखाई पड़ता है: भीतर एक ही तरंग, एक ही चैतन्य, एक ही ज्योति । दीये होंगे अलग दीयों के ढंग होंगे अलग, आकृति-रंग होंगे अलग; मगर ज्योति तो एक है! लेकिन जिसनें अपनी ही ज्योति नहीं देखी, वह किसके भीतर ज्योति को देखेगा! उसे तो चलती-फिरती लाशें दिखाई पड़ती हैं । वह खुद भी मुर्दा है और दूसरे भी उसे मुर्दा ही मालूम होते है । वह मुर्दों की बस्ती में जीता है ।

एक दुर्घटना घटी है और उस दुर्घटना के प्रति सचेत हो जाना जरूरी है, अन्यथा अपनी खोज न हो सकेगी । और जिसने स्वयं को न जाना उसने कुछ भी न जाना । वह जीया भी और जीया भी नहीं । वह जीया नही, बस मरा ही । उसके जन्म और मृत्यु के बीच में कुछ भी न घटा। अगर जन्म और मृत्यु के बीच में परमात्मा न घटे तो जानना कि कुछ भी न घटा; खाली आए, खाली गए । शायद कुछ गंवा कर गए, कमा कर नहीं ।

एक दुर्घटना हुई है और वह दुर्घटना है: मनुष्य की चेतना बहिर्मुखी हो गई है । सदियों में धीरे-धीरे यह हुआ, शनैः-शनै:, क्रमशः-क्रमश: । मनुष्य की आंखें बस बाहर थिर हो गई हैं, भीतर मुड़ना भूल गई हैं । तो कभी अगर धन से ऊब भी जाता है- और ऊबेगा ही कभी, कभी पद से भी आदमी ऊब जाता है-ऊबना ही पड़ेगा, सब थोथा है! कब तक भरमाओगे अपने को? भ्रम हैं तो टूटेंगे । छाया को कब तक सत्य मानोगे? माया का मोह कब तक धोखा देगा? सपनो मे कब तक अटके रहोगे? एक न एक दिन पता चलता है सब व्यर्थ है ।

लेकिन तब भी एक मुसीबत खड़ी हो जाती है । वे जो आंखें बाहर ठहर गई हैं, वे आंखें अब भी बाहर खोजती है । धन नहीं खोजती, भगवान खोजती है-मगर बाहर ही । पद नहीं खोजती, मोक्ष खोजती है-लेकिन बाहर ही । विषय बदल जाता है, लेकिन तुम्हारी जीवन-दिशा नहीं बदलती ।

और परमात्मा भीतर है, वह अंतर्यात्रा है । जिसकी भक्ति उसे बाहर के भगवान से जोडे हुए है, उसकी भक्ति भी धोखा है ।

मन ही पूजा मन ही धूप ।

चलना है भीतर! मन है मंदिर! उसी मन के अंतरगृह मे छिपा हुआ बैठा है मालिक ।

आदमी ने अपनी तरफ पीठ कर ली, यही उसका दुर्भाग्य है । रैदास याद दिलाते है : मुड़ो, अपनी ओर मुड़ो । मन ही पूजा मन ही धूप! छोडो मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे । वे सब तो आदमी के बनाए हुए हैं । खोजो अपने भीतर के चैतन्य में, क्योंकि वही परमात्मा से आया है । वही एक किरण है प्रकाश की, जो उस परम सूर्य तक ले जा सकती है, क्योंकि वह उस परम सूर्य से आती है । वही है सेतु।

 

अनुक्रम

1

आग के फूल

1

2

जीवन का रहस्य

27

3

क्या तू सोया जाग अयाना

53

4

मन माया है

81

5

गाइ गाइ अब का कहि गाऊं

109

6

आस्तिकता के स्वर

135

7

भगती ऐसी सुनहु रे भाई

159

8

सत्संग की महिमा

187

9

संगति के परताप महातम

211

10

आओ और डूबो

239

 

 

मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....

Deal 20% Off
Item Code:
NZA636
Cover:
Hardcover
Edition:
2011
ISBN:
9788172610258
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 7.0 inch
Pages:
279 (11 B/W illustrations)
Other Details:
Weight of the Book: 600 gms
Price:
$29.00
Discounted:
$23.20   Shipping Free
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$5.80 (20%)
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मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....
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पुस्तक के विषय में

रैदास कहते हैं: मैंने तो एक ही प्रार्थना जानी-जिस दिन मैंने मैंऔर मेराछोड़ दिया। वहीं बंदगी है। जिस दिन मैंने मैं और मेरा छोड़ दिया। क्योंकि मैं भी धोखा है और मेरा भी धोखा है। जब मैं भी नहीं रहता और कुछ मेरा भी नहीं रहता, तब जो शेष रह जाता है तुम्हारे भीतर, वही तुम हो, वही तुम्हारी ज्योति है-शाश्वत, अंनत, असीम। तत्वमसि! वही परमात्मा है। बंदगी की यह परिभाषा कि मैं और मेरा छूट जाए, तो सच्ची बंदगी।

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु: प्रेम बहुत नाजुक है, फूल जैसा नाजुक है! जीवन एक रहस्य है मन है एक झूठ, क्योंकि मन है जाल-वासनाओं का अप्प दीपो भव! अपने दीये खुद बनो प्रेम और विवाह साक्षीभाव और तल्लीनता ओशो के होने ने ही हमारे पूरे युग को धन्य कर दिया है। ओशो ने अध्यात्म के चिरंतन दर्शन को यथार्थ की धरती दे दी है।

आमुख

आदमी को क्या हो गया है? आदमी के इस बगीचे में फूल खिलने बंद हो गए! मधुमास जैसे अब आता नहीं । जैसे मनुष्य का हृदय एक रेगिस्तान हो गया है; मरूद्यान भी नही कोई । हरे वृक्षों की छाया भी न रही । दूर के पंछी बसेरा करें, ऐसे वृक्ष भी न रहे । आकाश को देखने वाली आंखे भी नहीं । अनाहत को सुनने वाले कान भी नही । मनुष्य को क्या हो गया है?

मनुष्य ने गरिमा कहां खो दी है? यह मनुष्य का ओज कहां गया? इसके मूल कारण की खोज करनी ही होगी । और मूल कारण कठिन नहीं है समझ लेना । जरा अपने ही भीतर खोदने की बात है और जड़ें मिल जाएंगी समस्या की । एक ही जड़ है कि हम अपने से वियुक्त हो गए हैं; अपने से ही टूट गए हैं अपने से ही अजनबी हो गए हैं!

और जो अपने से अजनबी है, वह सबसे अजनबी हो जाता है । अपने को जिसने पहचान लिया, उसकी सबसे पहचान हो जाती है । उसके लिए अजनबी भी अजनबी नहीं रह जाते, क्योंकि उसे दिखाई पड़ता है: भीतर एक ही तरंग, एक ही चैतन्य, एक ही ज्योति । दीये होंगे अलग दीयों के ढंग होंगे अलग, आकृति-रंग होंगे अलग; मगर ज्योति तो एक है! लेकिन जिसनें अपनी ही ज्योति नहीं देखी, वह किसके भीतर ज्योति को देखेगा! उसे तो चलती-फिरती लाशें दिखाई पड़ती हैं । वह खुद भी मुर्दा है और दूसरे भी उसे मुर्दा ही मालूम होते है । वह मुर्दों की बस्ती में जीता है ।

एक दुर्घटना घटी है और उस दुर्घटना के प्रति सचेत हो जाना जरूरी है, अन्यथा अपनी खोज न हो सकेगी । और जिसने स्वयं को न जाना उसने कुछ भी न जाना । वह जीया भी और जीया भी नहीं । वह जीया नही, बस मरा ही । उसके जन्म और मृत्यु के बीच में कुछ भी न घटा। अगर जन्म और मृत्यु के बीच में परमात्मा न घटे तो जानना कि कुछ भी न घटा; खाली आए, खाली गए । शायद कुछ गंवा कर गए, कमा कर नहीं ।

एक दुर्घटना हुई है और वह दुर्घटना है: मनुष्य की चेतना बहिर्मुखी हो गई है । सदियों में धीरे-धीरे यह हुआ, शनैः-शनै:, क्रमशः-क्रमश: । मनुष्य की आंखें बस बाहर थिर हो गई हैं, भीतर मुड़ना भूल गई हैं । तो कभी अगर धन से ऊब भी जाता है- और ऊबेगा ही कभी, कभी पद से भी आदमी ऊब जाता है-ऊबना ही पड़ेगा, सब थोथा है! कब तक भरमाओगे अपने को? भ्रम हैं तो टूटेंगे । छाया को कब तक सत्य मानोगे? माया का मोह कब तक धोखा देगा? सपनो मे कब तक अटके रहोगे? एक न एक दिन पता चलता है सब व्यर्थ है ।

लेकिन तब भी एक मुसीबत खड़ी हो जाती है । वे जो आंखें बाहर ठहर गई हैं, वे आंखें अब भी बाहर खोजती है । धन नहीं खोजती, भगवान खोजती है-मगर बाहर ही । पद नहीं खोजती, मोक्ष खोजती है-लेकिन बाहर ही । विषय बदल जाता है, लेकिन तुम्हारी जीवन-दिशा नहीं बदलती ।

और परमात्मा भीतर है, वह अंतर्यात्रा है । जिसकी भक्ति उसे बाहर के भगवान से जोडे हुए है, उसकी भक्ति भी धोखा है ।

मन ही पूजा मन ही धूप ।

चलना है भीतर! मन है मंदिर! उसी मन के अंतरगृह मे छिपा हुआ बैठा है मालिक ।

आदमी ने अपनी तरफ पीठ कर ली, यही उसका दुर्भाग्य है । रैदास याद दिलाते है : मुड़ो, अपनी ओर मुड़ो । मन ही पूजा मन ही धूप! छोडो मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे । वे सब तो आदमी के बनाए हुए हैं । खोजो अपने भीतर के चैतन्य में, क्योंकि वही परमात्मा से आया है । वही एक किरण है प्रकाश की, जो उस परम सूर्य तक ले जा सकती है, क्योंकि वह उस परम सूर्य से आती है । वही है सेतु।

 

अनुक्रम

1

आग के फूल

1

2

जीवन का रहस्य

27

3

क्या तू सोया जाग अयाना

53

4

मन माया है

81

5

गाइ गाइ अब का कहि गाऊं

109

6

आस्तिकता के स्वर

135

7

भगती ऐसी सुनहु रे भाई

159

8

सत्संग की महिमा

187

9

संगति के परताप महातम

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