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बच्चन मधुशाला: Bachchan Madhushala

पुस्तक के विषय में

बच्चन मधुशाला

हिन्दी गीति काव्य के महान कवि बच्चन की मधुशाला ने 75वें वसन्त की भीनी और मोहक गन्ध के बीच मदभरा स्वप्न देख लिया। स्वप्न ऐसा कि जो भविष्य की ओर इंगित करता है कि अभी और बरसेगा मधुरस और पियेंगे अभी पाठकगण युगों-युगों तक याद रहेगी मधुशाला।

रस भीनी मधुरता में डूबी यह वह मधुशाला है, जिसने पहला वसन्त 1935 में देखा और अब तक कई पीढ़ियों ने इसका रसपान किया।

मधुशाला की एक एक रुबाई पाठक के रागात्मक भावों को जगाकर उसके कोमल और एकान्तिक क्षणों को अद्भुत मादकता में रसलीन कर देती है।

स्वर्ण जयन्ती के अवसर पर बच्चन जी द्वारा लिखी गई चार नई रुबाइयां भी पुस्तक में शामिल कर ली गई हैं।

श्रद्धांजलि स्वरूप

भारतीय साहित्य की भूमि पर बच्चन द्वारा चलाई गई काव्य की अलख सदा चलती रहेगी । छायावादी दौर में उन्होंने जितनी सरल और सुन्दर भाषा में काव्य रचा, जिसने हिन्दी साहित्य को आलोकित किया।

वे प्रोफेसर तो अंग्रेजी के थे, लेकिन लिखा हिन्दी भाषा में, वो भी जन- सामान्य की हिन्दी भाषा में। बच्चन पहले भारतीय थे जिन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में पी-एचडी की, लेकिन अपने पांव हिन्दी क्षेत्र की भूमि पर जमाए। हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषा पर उनकी पकड़ के बारे में उनका साहित्य बोलता है। एक तरफ़ अंग्रेजी साहित्य में डब्ल्यू बी यीट्स पर किया गया शोध, शेक्सपीयर की रचनाओं का किया गया अनुवाद; तो दूसरी तरफ़ भारतीय साहित्य में ख़ैयाम की मधुशाला, रामायण शैली में लिखी गई 'जनगीता' इसका सटीक उदाहरण हैं। बच्चन ने जितनी निष्ठा और कर्मठता से अपनी अनुभूतियों को शब्द दिए, उतने ही भावपूर्ण तरीक़े से अनुवाद-कार्य किया। निस्सन्देह बच्चन ने साहित्य की एक नई धारा का सूत्रपात किया।

उनकी बहुमुखी प्रतिभा की झलक उनके रचना-संसार से तो मिलती ही है, उनकी जिन्दगी से भी मिलती है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन-कार्य के अलावा उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और विदेश मन्त्रालय में भी काम किया । और फिर राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। अपनी प्रतिबद्धता, कर्मठता और विशेष रूप से मौलिकता का परिचय बच्चन ने हर पद पर दिया। बच्चन ने राजभाषा समिति के अध्यक्ष पद पर रहते हुए सौराष्ट्र मन्त्रालय को गृह मन्त्रालय और पर राष्ट्र मन्त्रालय को विदेश मन्त्रालय का नाम देने में योगदान किया।

बच्चन की प्रतिभा लाजवाब थी। उनके अध्यापन के समय का किस्सा है। विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी भाषा के प्रोफ़ेसर होने के बावजूद, डीन उन्हें हिन्दी पढ़ाने के लिए कह देते थे और बच्चन बड़ी सहजता से हिन्दी भाषा की कक्षा भी ले लेते थे । बच्चन के समकालीन साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, भगवती चरण वर्मा, डी धर्मवीर भारती, शिवमंगल सिंह सुमन उनके जबरदस्त प्रशंसक थे। सभी ने बच्चन पर, उनके साहित्य पर खुले दिल से अपनी-अपनी राय व्यक्त की है।

मधुशाला बच्चन की एक ऐसी कृति है जिसने लोगों को उनका दीवाना बना दिया था । मंच पर जब उनके नाम की घोषणा की जाती थी तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता था। उनके प्रशंसकों की भारी भीड़ जुटी रहती थी, लोग उनके ऑटोग्राफ लेने के लिए बेताब रहते थे जैसे कि हरिवंश राय बच्चन अमिताभ बच्चन हों । शहरों और गांव की गली-गली में मधुशाला की रुबाइयां गाई जाती थीं वो भी बच्चन के स्टाइल में, क्योंकि बच्चन का कविता-पाठ करने का अन्दाज मधुशाला की प्रसिद्धि का दूसरा स्तम्भ था।

बच्चन की आत्मीयता का कोई छोर नहीं था । उनके पास जाने वाला हर शक्स उनका अपना हो जाता था । संस्कार और अनुशासन तो उनके व्यक्तित्व के दो आयाम थे । जितनी सादगी से बच्चन रहते थे, उतनी ही सरलता और सहजता से उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी । जिसके लिए बच्चन को सरस्वती सम्मान से पुरस्कृत भी किया गया । आचार्य द्विवेदी ने इनकी आत्मकथा को उम्र और परिवेश का लेखा-जोखा बताया तो डी भारती ने इसे बहादुरी और पूरी ईमानदारी से अपने जीवन को कहने की कोशिश बताया।

अपनी इसी सादगी और बेबाक़ी के बूते ही बच्चन ने लोगों के दिलों पर राज किया। लोगों के बीच बच्चन की लोकप्रियता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे जमीन से जुड़े नेता अपने आन्दोलन की अलाव इनकी कविता से जलाते थे, वहीं गांधीजी भी मधुशाला की रुबाइयां सुनकर प्रसन्न हो गए थे।

कहने को तो बच्चन को विशुद्ध आस्तिक कहा जाता था, क्योंकि वे नियम से मन्दिर जाते थे, लेकिन अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में साफ़गोई से दर्ज कराते हैं कि उन्हें किसी आत्मसुख और अध्यात्म का अहसास नहीं हुआ बल्कि वे हमेशा खाली-खाली, कमजोर, अक्षम और अकुशल महसूस करते रहे। लेकिन जीवन के प्रति जो सम्मान और भावात्मक लगाव उन्होंने महसूस किया है, उसे मधुशाला में उतारा है। सुमित्रानन्दन पन्त ने लिखा है:

''बच्चन की मदिरा चैतन्य की ज्वाला है, जिसे पीकर मृत्यु भी जीवित हो उठती है। उसका सौन्दर्य-बोध देश-काल की क्षणभंगुरता को अतिक्रम कर शाश्वत के स्पर्श से अम्लान एवं अनन्त यौवन है। यह निस्सन्देह बच्चन के अन्तरतम का भारतीय संस्कार है, जो उसके मधु-काव्य में अज्ञात रूप से अभिव्यक्त हुआ है। बच्चन की मदिरा ग़म ग़लत करने या दुख को भुलाने के लिए नहीं है, वह शाश्वत जीवन-सौन्दर्य एवं शाश्वत प्राणचेतना-शक्ति की सजीव प्रतीक है।

मधुशाला से लिए गए उद्धरण देखिए:

'पहले भोग लगा लूं तेरा, फिर प्रसाद जग पाएगा,

सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला'

'प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,

अपने को मुझमें भर कर तू बनता है पीनेवाला'

'कभी न कण भर खाली होगा लाख पिएं, दो लाख पिएं'

'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला'

'बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,

रहे न हाला, प्यासा, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।'

अब बच्चन के गद्य की एक बानगी देखिए:

''आधी रात के बाद रात की एक ऐसी घड़ी आती है जब तारों की पलकों पर भी ख़ुमारी छा जाती है, सदा चलती रहनेवाली हवा एकदम थम जाती है, न एक डाली हिलती है, न एक पत्ता, न एक तिनका डोलता है, न एक किनका खिसकता है। इस समय दुस्सह से दुस्सह पीड़ा शान्त हो जाती है, कड़ी से कड़ी चोट का दर्द जाता रहता है, बड़ी से बड़ी चिन्ता का पंजा ढीला हो जाता है, बेचैन से बेचैन मरीज को चैन आ जाता है। दमहे की भी आख लग जाती है, बिरहिन के भी आसू की लड़ी टूट जाती है और महाकाली रात महाकाल की छाती पर सिर धरकर एक झपकी ले लेती है - वह घड़ी काल की गणना में नहीं आती।''

अगर बच्चन की कृतियां अनूदित होकर विश्व के अन्य देशों में पहुंचतीं, तो हाला, प्याला और मधुबाला के रसिक काव्य पर वहां के लोग भी झूमते। और उसकी मस्ती नोबल पुरस्कार वालों तक पहुंचती । हालांकि जो सम्मान और आदर बच्चन को भारतीय लोगों ने दिया, वह नोबल से कई-कई गुणा ज्यादा है।

बच्चन हिन्दी काव्य के प्रेमियों के सबसे अधिक प्रिय कवि है, और उनकी 'मधुशाला लगभग छ: दशक से लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान है । सर्वप्रथम 1935 में प्रकाशित होने के बाद से अब तक इसके अनेक संस्करणों की कई लाख प्रतियाँ पाठकों तक पहुँच चुकी हैं । महाकवि पन्त के शब्दों में ''मधुशाला की मादकता अक्षय है।'' मधुशाला में हाला, प्याला, मधुबाला और मधुशाला के चार प्रतीकों के माध्यम से कवि ने अनेक क्रान्तिकारी, मर्मस्पर्शी, रागात्मक एवं रहस्यपूर्ण भावों को वाणी दी है। हम पाठकों को 'मधुशाला की मस्ती और मादकता में खो जाने के लिए आमन्त्रित करते हैं।

 

कविता सीरीज़

1

मधुशाला बचन

2

तुम्हारे लिए नीरज

3

कारवां गुजर गया नीरज

4

नीरज की पाती नीरज

5

फिर दीप जलेगा नीरज

6

दीवान ए ग़ालिब ग़ालिब

7

मीना कुमारी की शायरी गुलज़ार

8

मुशायरा सं प्रकाश पण्डित

9

उर्दू की बेहतरीन शायरी सं प्रकाश पण्डित

10

जब्तशुदा नज़्में

11

कामायनी जयशंकर प्रसाद

12

बुल्लेशाह

13

शेख फ़रीद

14

मीरा

15

कबीर

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