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Books > Hindi > सन्त वाणी > स्वामी रामसुखदास > सब जग ईश्वर है: All World is God
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सब जग ईश्वर है: All World is God
सब जग ईश्वर है: All World is God
Description

नम्र निवेदन

विश्वमें हिन्दू मुस्लिम, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि अनेक धर्म, मत, सम्प्रदाय हैं । एक एक धर्ममें भी अनेक अवान्तर भेद हैं । इतना ही नहीं, एक ही धर्म, मत, सम्प्रदायको माननेवाले दो मनुष्योंमें भी परस्पर पूरे विचार नहीं मिलते । संसारमें दर्शन भेद, मान्यता भेद, रुचि भेद, वर्ग भेद, जाति भेद, वर्ण भेद, आश्रम भेद, देश भेद, प्राप्त भेद, भाषा भेद आदि अनेक भेद विद्यमान हैं । परन्तु भगवद्गीताका सिद्धान्त सम्पूर्ण भेदोंसे अतीत तथा व्यापक है और सब भेदोंमें एकता, समन्वय करनेवाला है । जो मतभेद दीखता है वह भगवद्गीतामें नहीं है, प्रत्युत टीकाकारोंमें है । गीताका सर्वोपरि सिद्धान्त है वासुदेव सर्वम् (७ । १९) । अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही हैं । इस सिद्धान्तमें कोई मतभेद रहता ही नहीं, सम्पूर्ण मतभेद समाप्त हो जाते हैं । कारण कि सम्पूर्ण मतभेद अहम्से पैदा होते हैं और वासुदेव सर्वम् में अहम् का सर्वथा नाश है । इसलिये गीता सभी धर्म, मत, सम्प्रदायके लोगोंको प्रिय लगती है । गीतारूपी दर्पणमें सभी लोग अपने अपने मतका दर्शन करते हैं क्योंकि गीता परमात्माके अलौकिक समग्ररूपका वर्णन करती है । समग्रतामें कोई भेद नहीं रहता ।

गीता व्यवहारमें एकता न करके तत्त्वमें एकता करती है । व्यवहारमें भेद उचित भी है और आवश्यक भी । व्यवहारकी एकता पशुता है और भिन्नता (यथायोग्य व्यवहार) मनुष्यता है । व्यवहारमें एकता करना और तत्त्वमें भिन्नता मानना दोनों ही दोषी हैं । इसलिये गीता व्यावहारिक भेदको दूर न करके तात्त्विक (दार्शनिक) भेदको दूर करती है समवर्तनकी शिक्षा न देकर समदर्शनकी शिक्षा देती है । वर्तमानमें विश्व बन्धुत्वका सिद्धान्त श्रेष्ठ माना जाता है परन्तु भाई भाईमें भी स्वार्थ और अभिमानवश मतभेद, बँटवारा, लड़ाई हो जाती है । जैसे, कौरवों और पाण्डवोंमें लड़ाई हो गयी थी । विश्व बन्धुत्वसे भी श्रेष्ठ आत्मभावका सिद्धान्त है परन्तु सबको अपनी आत्मा माननेपर भी सूक्ष्म अहम् रह जाता है जो सम्पूर्ण मतभेदोंका जनक है । आत्मभावसे भी श्रेष्ठ भगवद्भावका सिद्धान्त है वासुदेव सर्वम् । सबमें भगवान्को देखनेसे कोई मतभेद रहता ही नहीं निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ( मानस, उत्तर० ११२ ख) । कारण कि भगवान् सभीके इष्ट हैं । अपने इष्टमें तो पूज्यभाव, आदरभाव रखा जाता है । जिसमें इष्टभाव, पूज्यभाव, आदरभाव होता है, उससे विरोध कैसे सम्भव है? शिवमहिम्नस्तोत्रमें आया है

त्रयी सांख्यं योग पशुपतिमतं वैधावमिति

प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमद पथ्यमिति च ।

रुचीनां वैचित्रादृजुकुटिलनानापथजुषां

नृणामेको गम्यस्लमसि पयसामर्णव इव । । ७ । ।

हे प्रभो! वैदिकमत (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद), सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, शैवमत, वैष्णवमत आदि विभिन्न मत मतान्तर हैं इनमें हमारा मत उत्तम, लाभप्रद है इस प्रकार रुचियोंकी विचित्रता (रुचिभेद) के कारण अनेक सीधे टेढ़े मार्गोंसे चलनेवाले मनुष्योंके लिये एकमात्र प्रापणीय स्थान आप ही हैं । जैसे सीधे टेढ़े मार्गोंसे बहती हुई सभी नदियों अन्तमें समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार सभी मतावलम्बी अन्तमें आपके पास ही पहुँचते हैं ।

अपने मतका आग्रह होनेसे मनुष्य दूसरे मतकी बातें पढ़ता सुनता ही नहीं, जिससे वह दूसरे मतकी उत्तम बातोंसे वंचित रहता है तथा उसकी बुद्धि संकीर्ण और राग द्वेषसे युक्त रहती है । परन्तु अपने मतका आग्रह न होनेसे मनुष्य अपने मतका अनुसरण करते हुए भी दूसरे मतकी उत्तम, लाभप्रद बातोंको ग्रहण कर सकता है । वह दूसरे मतका तथा उसको माननेवालोंका आदर करता है । इससे उसकी बुद्धिका, ज्ञानका विकास होता है और वह अपने साधनमें शीघ्रतापूर्वक उन्नति करके परमसिद्धि प्राप्त कर लेता है । इसलिये परमात्मप्राप्तिके इच्छुक साधकोंको अनुष्ठान तो अपने मतका ही करना चाहिये, पर अपने मतका आग्रह पक्षपात न रखकर सभी मतोंका आदर करना चाहिये । सब कुछ भगवान् ही हैं इस सिद्धान्तको माननेसे सबका अलग अलग मत एवं तदनुसार अलग अलग कर्तव्य होते हुए भी उनमें परस्पर भेदबुद्धि नहीं होती, द्वेष नहीं होता, लड़ाई नहीं होती, प्रत्युत उनमें परस्पर प्रेमभाव रहता है । इसलिये भगवद्गीताने कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, राजयोगी आदि किसी भी योगीको दुर्लभ महात्मा नहीं बताया है, प्रत्युत सब कुछ भगवान! ही हैं इसका अनुभव करनेवालेको ही अत्यन्त दुर्लभ महात्मा बताया है वासुदेव सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ (७ । १९) । इसी सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्तको साधक सुगमतापूर्वक समझ सकें और शीघ्र परमसिद्धि प्राप्त कर सकें इस उद्देश्यसे यह पुस्तक लिखी गयी है ।

प्रस्तुत पुस्तकसे पहले भी वासुदेव सर्वम् नामसे एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है पर वह ज्ञानयोगकी मुख्यतासे लिखी गयी थी, जबकि प्रस्तुत पुस्तक सब जग ईश्वररूप है भक्तियोगकी मुख्यतासे लिखी गयी है । गीतामें भी भगवान्ने वासुदेव सर्वम् की बात भक्तियोगकी दृष्टिसे कही है ।

इस पुस्तकमें जो बातें आयी हैं, वे बुद्धिका विषय नहीं हैं अर्थात् वे केवल सीखने सिखानेके लिये नहीं है प्रत्युत अनुभव करनेके लिये हैं । आशा है, भगवत्प्रेमी साधकोंको यह पुस्तक एक अलौकिक दृष्टि प्रदान करेगी ।

 

विषय सूची

1

सब जग ईश्वररूप है (वासुदेव सर्वम्)

1

2

विविध रूपोंमें भगवान्

11

3

सर्वत्र भगवद्दर्शन

19

4

भगवत्प्राप्तिका सुगम तथा शीघ्र सिद्धिदायक साधन

30

5

गीताकी विलक्षण बात

37

6

अपने प्रभुको कैसे पहचानें?

49

7

भगवान्का अलौकिक समग्ररूप

57

8

अलौकिक साधन भक्ति

68

9

प्रार्थना

78

 

सब जग ईश्वर है: All World is God

Item Code:
GPA172
Cover:
Paperback
Edition:
2013
Language:
Sanskrit Text With Hindi Translation
Size:
8.0 inch X 5.5 inch
Pages:
90
Other Details:
Weight of the Book: 80 gms
Price:
$3.00   Shipping Free
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नम्र निवेदन

विश्वमें हिन्दू मुस्लिम, ईसाई, पारसी, यहूदी आदि अनेक धर्म, मत, सम्प्रदाय हैं । एक एक धर्ममें भी अनेक अवान्तर भेद हैं । इतना ही नहीं, एक ही धर्म, मत, सम्प्रदायको माननेवाले दो मनुष्योंमें भी परस्पर पूरे विचार नहीं मिलते । संसारमें दर्शन भेद, मान्यता भेद, रुचि भेद, वर्ग भेद, जाति भेद, वर्ण भेद, आश्रम भेद, देश भेद, प्राप्त भेद, भाषा भेद आदि अनेक भेद विद्यमान हैं । परन्तु भगवद्गीताका सिद्धान्त सम्पूर्ण भेदोंसे अतीत तथा व्यापक है और सब भेदोंमें एकता, समन्वय करनेवाला है । जो मतभेद दीखता है वह भगवद्गीतामें नहीं है, प्रत्युत टीकाकारोंमें है । गीताका सर्वोपरि सिद्धान्त है वासुदेव सर्वम् (७ । १९) । अर्थात् सब कुछ परमात्मा ही हैं । इस सिद्धान्तमें कोई मतभेद रहता ही नहीं, सम्पूर्ण मतभेद समाप्त हो जाते हैं । कारण कि सम्पूर्ण मतभेद अहम्से पैदा होते हैं और वासुदेव सर्वम् में अहम् का सर्वथा नाश है । इसलिये गीता सभी धर्म, मत, सम्प्रदायके लोगोंको प्रिय लगती है । गीतारूपी दर्पणमें सभी लोग अपने अपने मतका दर्शन करते हैं क्योंकि गीता परमात्माके अलौकिक समग्ररूपका वर्णन करती है । समग्रतामें कोई भेद नहीं रहता ।

गीता व्यवहारमें एकता न करके तत्त्वमें एकता करती है । व्यवहारमें भेद उचित भी है और आवश्यक भी । व्यवहारकी एकता पशुता है और भिन्नता (यथायोग्य व्यवहार) मनुष्यता है । व्यवहारमें एकता करना और तत्त्वमें भिन्नता मानना दोनों ही दोषी हैं । इसलिये गीता व्यावहारिक भेदको दूर न करके तात्त्विक (दार्शनिक) भेदको दूर करती है समवर्तनकी शिक्षा न देकर समदर्शनकी शिक्षा देती है । वर्तमानमें विश्व बन्धुत्वका सिद्धान्त श्रेष्ठ माना जाता है परन्तु भाई भाईमें भी स्वार्थ और अभिमानवश मतभेद, बँटवारा, लड़ाई हो जाती है । जैसे, कौरवों और पाण्डवोंमें लड़ाई हो गयी थी । विश्व बन्धुत्वसे भी श्रेष्ठ आत्मभावका सिद्धान्त है परन्तु सबको अपनी आत्मा माननेपर भी सूक्ष्म अहम् रह जाता है जो सम्पूर्ण मतभेदोंका जनक है । आत्मभावसे भी श्रेष्ठ भगवद्भावका सिद्धान्त है वासुदेव सर्वम् । सबमें भगवान्को देखनेसे कोई मतभेद रहता ही नहीं निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ( मानस, उत्तर० ११२ ख) । कारण कि भगवान् सभीके इष्ट हैं । अपने इष्टमें तो पूज्यभाव, आदरभाव रखा जाता है । जिसमें इष्टभाव, पूज्यभाव, आदरभाव होता है, उससे विरोध कैसे सम्भव है? शिवमहिम्नस्तोत्रमें आया है

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प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमद पथ्यमिति च ।

रुचीनां वैचित्रादृजुकुटिलनानापथजुषां

नृणामेको गम्यस्लमसि पयसामर्णव इव । । ७ । ।

हे प्रभो! वैदिकमत (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद), सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, शैवमत, वैष्णवमत आदि विभिन्न मत मतान्तर हैं इनमें हमारा मत उत्तम, लाभप्रद है इस प्रकार रुचियोंकी विचित्रता (रुचिभेद) के कारण अनेक सीधे टेढ़े मार्गोंसे चलनेवाले मनुष्योंके लिये एकमात्र प्रापणीय स्थान आप ही हैं । जैसे सीधे टेढ़े मार्गोंसे बहती हुई सभी नदियों अन्तमें समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार सभी मतावलम्बी अन्तमें आपके पास ही पहुँचते हैं ।

अपने मतका आग्रह होनेसे मनुष्य दूसरे मतकी बातें पढ़ता सुनता ही नहीं, जिससे वह दूसरे मतकी उत्तम बातोंसे वंचित रहता है तथा उसकी बुद्धि संकीर्ण और राग द्वेषसे युक्त रहती है । परन्तु अपने मतका आग्रह न होनेसे मनुष्य अपने मतका अनुसरण करते हुए भी दूसरे मतकी उत्तम, लाभप्रद बातोंको ग्रहण कर सकता है । वह दूसरे मतका तथा उसको माननेवालोंका आदर करता है । इससे उसकी बुद्धिका, ज्ञानका विकास होता है और वह अपने साधनमें शीघ्रतापूर्वक उन्नति करके परमसिद्धि प्राप्त कर लेता है । इसलिये परमात्मप्राप्तिके इच्छुक साधकोंको अनुष्ठान तो अपने मतका ही करना चाहिये, पर अपने मतका आग्रह पक्षपात न रखकर सभी मतोंका आदर करना चाहिये । सब कुछ भगवान् ही हैं इस सिद्धान्तको माननेसे सबका अलग अलग मत एवं तदनुसार अलग अलग कर्तव्य होते हुए भी उनमें परस्पर भेदबुद्धि नहीं होती, द्वेष नहीं होता, लड़ाई नहीं होती, प्रत्युत उनमें परस्पर प्रेमभाव रहता है । इसलिये भगवद्गीताने कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, ध्यानयोगी, राजयोगी आदि किसी भी योगीको दुर्लभ महात्मा नहीं बताया है, प्रत्युत सब कुछ भगवान! ही हैं इसका अनुभव करनेवालेको ही अत्यन्त दुर्लभ महात्मा बताया है वासुदेव सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ (७ । १९) । इसी सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्तको साधक सुगमतापूर्वक समझ सकें और शीघ्र परमसिद्धि प्राप्त कर सकें इस उद्देश्यसे यह पुस्तक लिखी गयी है ।

प्रस्तुत पुस्तकसे पहले भी वासुदेव सर्वम् नामसे एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है पर वह ज्ञानयोगकी मुख्यतासे लिखी गयी थी, जबकि प्रस्तुत पुस्तक सब जग ईश्वररूप है भक्तियोगकी मुख्यतासे लिखी गयी है । गीतामें भी भगवान्ने वासुदेव सर्वम् की बात भक्तियोगकी दृष्टिसे कही है ।

इस पुस्तकमें जो बातें आयी हैं, वे बुद्धिका विषय नहीं हैं अर्थात् वे केवल सीखने सिखानेके लिये नहीं है प्रत्युत अनुभव करनेके लिये हैं । आशा है, भगवत्प्रेमी साधकोंको यह पुस्तक एक अलौकिक दृष्टि प्रदान करेगी ।

 

विषय सूची

1

सब जग ईश्वररूप है (वासुदेव सर्वम्)

1

2

विविध रूपोंमें भगवान्

11

3

सर्वत्र भगवद्दर्शन

19

4

भगवत्प्राप्तिका सुगम तथा शीघ्र सिद्धिदायक साधन

30

5

गीताकी विलक्षण बात

37

6

अपने प्रभुको कैसे पहचानें?

49

7

भगवान्का अलौकिक समग्ररूप

57

8

अलौकिक साधन भक्ति

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